रविवार, 24 मई 2026

लेख, क्या हमे सिर्फ बेटी ही बचानी है अपने बेटे नहीं?


     आजकल भोपाल के एक केस की पुरे देश में बहुत चर्चा हो रही है और जोर शोर से बेटी बचाओ बेटी बचाओ गुंज रहा है और दहेज प्रथा को इसका मुल कारण माना जा रहा है, चलिए ठीक है लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि आखिर आज भी हमारे समाज में दहेज़ प्रथा चल क्यों रही है सिर्फ दहेज़ मांगने वाले लोगों के कारण या दहेज़ देने वालों के कारण जो अपनी बेटियों के लिए अमिर दामाद खरीदने की कामना करते हैं। 

     और क्या आज समाज में रिवर्स दहेज़ नहीं चल रहा है,जी हां मैं तलाक के बाद महिलाओं को मिलने वाली मोटी रकम जीसे कानुनी भाषा में एल्युमनी, मेंटेनेंस उसकी बात कर रहा हूं क्या यह सीधे तौर पर रिवर्स दहेज़ प्रथा नहीं है। क्या इस रिवर्स दहेज़ के कारण बेटे आत्महत्या नहीं कर रहे हैं क्या रिवर्स दहेज़ लोभी महिलाओं और उनके परिवारों के कारण लड़के आत्महत्या नहीं कर रहे हैं उनके परिवार नहीं उजड़ रहे हैं। 

     हर बार किसी बेटी की मौत पर बेटी बचाने की गुहार लगाने वाले लोग क्या बेटों को नहीं बचाना चाहते।बेटे भी बचाइए बेटे न तो गुगल से डाऊनलोड होते हैं और ना ही एआई से जनरेट होते हैं उन्हें भी माएं ही जन्म देती हैं। 

     एक बेटे को आत्महत्या के लिए उकसाने वाली पत्नी या पूर्व पत्नी और उसका परिवार भी उतना ही बड़ा गुनहगार है जीतना बड़ा एक बेटी को आत्महत्या के लिए उकसाने वाला उसका पति या पूर्व पति और उसका परिवार। 

     अब समय है कि अपराध को अपराध की तरह देखा जाना चाहिए उसे बेटी और बेटे के सांचे में ढालकर नहीं।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

महिलाओं के खिलाफ अपराध पर पुरुष संवेदनहीन या या स्वयं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर मौन है और महिलाओं की संवेदना पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कहां है एक विमर्श

श में जिस देश में पुरुष एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से। 


जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता। 


जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं। 


अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं। एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से।

जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता।

जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं।

अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं।

जिस देश में पुरुष एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से।

जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता।

जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं।

अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

ग्रोक एआई का विरोध क्यों किया जा रहा है और ऐसे एआई के नुक्सानों पर चर्चा।


यह एआई चैट बांट अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क कि कम्पनी एक्स जो पहले ट्वीटर थी का ही एक एआई टूल है जो उपयोगकर्ताओं को उनकी जरुरत के अनुसार जानकारी प्राप्त करने तथा तस्वीरों को निर्मित एवं सम्पादित करने की सुविधा देता है पर अक्सर यह ऐसी जानकारी भी दे देता है जो उपयोगकर्ता द्वारा पूछी ही नहीं गई है। 


यह जो टूल है यह सब्सक्रिप्शन के साथ असिमित फ़ोटो एवं विडियो बनाने की मशिन बन गया है लेकिन सबसे अधिक चिंता कि बात यह है कि इससे बड़ी ही आसानी से किसी भी तस्वीर को अश्लील बनाया जा सकता है और यह एआई यह फर्क करने में असक्षम है कि जिस तस्वीर को यह प्राम्प्ट के अनुसार बदल रहा है वो एआई के द्वारा बनाई गई है या फिर किसी वास्तविक व्यक्ति की है। 


मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले इसे अलग अलग एकाउंट के माध्यम से लगभग तीन महिने तक इस्तेमाल करता रहा हूं। विडियो बनाने वाली इसकी सुविधा तो और भी गैर-निष्पादित और अनियंत्रित है, इससे किसी भी तस्वीर को अश्लील विडियो मे बदला जा सकता है और किसी भी महिला कैसी भी अश्लील हरकत करते हुए दिखाया जा सकता है। यह पुरी तरह से महिलाओं के लिए और पुरुषों के लिए भी असुरक्षित है। 


ग्रोक एआई जैसे जितने भी एआई टूल है या तो उन्हें प्रतिबंध किया जाना चाहिए या इन पर सख़्त निगरानी रखनी चाहिए और यह जिम्मेदारी भारत सरकार कि है कि ग्रोक एआई जैसे सभी एआई भारत के कानूनों को सख्ती से माने और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इन जैसे एआई टूल से किसी व्यक्ति कि गरिमा को कोई हानि ना पहुंचे। 


यह सत्य है कि एआई का सही उपयोग इसे वरदान बना सकता है लेकिन एक गैरजिम्मेदार और अनियंत्रित एआई इस वरदान को अभिशाप मे भी बदल सकता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा एआई बाजार बनने की राह पर है पर इसके लिए हमे जिम्मेदार एआई चाहिए ना कि अनियंत्रित और गैरजिम्मेदार।