गुरुवार, 5 मार्च 2026

ग्रोक एआई का विरोध क्यों किया जा रहा है और ऐसे एआई के नुक्सानों पर चर्चा।


यह एआई चैट बांट अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क कि कम्पनी एक्स जो पहले ट्वीटर थी का ही एक एआई टूल है जो उपयोगकर्ताओं को उनकी जरुरत के अनुसार जानकारी प्राप्त करने तथा तस्वीरों को निर्मित एवं सम्पादित करने की सुविधा देता है पर अक्सर यह ऐसी जानकारी भी दे देता है जो उपयोगकर्ता द्वारा पूछी ही नहीं गई है। 


यह जो टूल है यह सब्सक्रिप्शन के साथ असिमित फ़ोटो एवं विडियो बनाने की मशिन बन गया है लेकिन सबसे अधिक चिंता कि बात यह है कि इससे बड़ी ही आसानी से किसी भी तस्वीर को अश्लील बनाया जा सकता है और यह एआई यह फर्क करने में असक्षम है कि जिस तस्वीर को यह प्राम्प्ट के अनुसार बदल रहा है वो एआई के द्वारा बनाई गई है या फिर किसी वास्तविक व्यक्ति की है। 


मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले इसे अलग अलग एकाउंट के माध्यम से लगभग तीन महिने तक इस्तेमाल करता रहा हूं। विडियो बनाने वाली इसकी सुविधा तो और भी गैर-निष्पादित और अनियंत्रित है, इससे किसी भी तस्वीर को अश्लील विडियो मे बदला जा सकता है और किसी भी महिला कैसी भी अश्लील हरकत करते हुए दिखाया जा सकता है। यह पुरी तरह से महिलाओं के लिए और पुरुषों के लिए भी असुरक्षित है। 


ग्रोक एआई जैसे जितने भी एआई टूल है या तो उन्हें प्रतिबंध किया जाना चाहिए या इन पर सख़्त निगरानी रखनी चाहिए और यह जिम्मेदारी भारत सरकार कि है कि ग्रोक एआई जैसे सभी एआई भारत के कानूनों को सख्ती से माने और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इन जैसे एआई टूल से किसी व्यक्ति कि गरिमा को कोई हानि ना पहुंचे। 


यह सत्य है कि एआई का सही उपयोग इसे वरदान बना सकता है लेकिन एक गैरजिम्मेदार और अनियंत्रित एआई इस वरदान को अभिशाप मे भी बदल सकता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा एआई बाजार बनने की राह पर है पर इसके लिए हमे जिम्मेदार एआई चाहिए ना कि अनियंत्रित और गैरजिम्मेदार।

शनिवार, 31 जनवरी 2026

यूजीसी का नया कानून विरोध, विवाद और रोक तथा शिक्षण संस्थानों में भेदभाव पर एक विमर्श

 यूजीसी के जारी किए गए नए कानून पर हो रहा विरोध या इस नियम कि प्रासंगिकता और कमियों पर बात करना आवश्यक हो जाता है हालांकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी है तब भी इस विषय पर चर्चा होनी चाहिए। 



भेदभाव को लेकर कोई संशय नहीं है कि ये वर्तमान समाज कि एक कड़वी सच्चाई है जिसे हम सब कुछ कम या ज्यादा पर स्वीकार करते हैं और उच्च शिक्षा संस्थान इसमें कोई अपवाद नहीं हैं पर यह भी जरुरी है कि किसी एक वर्ग को ऐसा ना लगे कि उसे ही निशाना बनाया जा रहा है और जाहिर सी बात है इसी कारण से माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाई है। 

जहां तक भेदभाव कि बात है ये तो उच्च शिक्षा संस्थान के स्तर तक ही नही स्कूल स्तर तक है और मेरे साथ ही ये भेदभाव स्कूल में ही किया गया है। मैं अपना नीजि अनुभव बता रहा हूं, मुझे कक्षा आठ और नौ में कम नम्बर दिए जाते थे क्योंकि हम पढ़ने में अच्छे थे और कोई सवर्ण ऐसा नहीं था और हमारे हेडमास्टर  थे वो सवर्ण वर्ग के थे मै जानबुझकर जाती नहीं लिख रहा हूं नहीं तो कुछ लोग विफर जाएंगे और सबसे हैरत कि बात ये है कि जिस स्कूल कि बात मैं कर रहा हूं वो स्कूल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित था आज भी है फिर भी मैं अपने गुरुओं का पुरा सम्मान करता था, करत हूं और करता रहूंगा।

अब आप ये कह सकते है कि आप तो उस वक्त बच्चे थे आप को कैसे पता कि शिक्षक जानबूझकर कम नंबर दे रहे थे और भेदभाव कर रहे थे तो उस वक्त हम लोगों को परिक्षा परिणाम घोषित होने के बाद कापियां दिखाई जाती थी, तो ऐसा कम से कम तीन से चार बार हुआ कि मैं ने कापि देखने के बाद जब मैंने आचार्य जी को कहा तो उन्होंने ने मेरे नंबर सुधारें। कक्षा नौ कि अंकसूची में वाकायदा प्रिंसिपल सर के सुधार के दस्तखत है।

तो मेरा ये कहना है कि ऐसा तो है नही की जो पाठ मैं ने आचार्य जी से सिखा और फिर पेपर मे उत्तर लिखा वो कापि जांचने के समय आचार्य जी स्वयं ही भुल जाते होंगे।

तो आप ये माने या ना माने पर भेदभाव तो है पर मैने नीजि तौर पर उच्च शिक्षा मे यह अनुभव नही किया है।

और मै समानता को वास्तविक रुप में चाहता हूं इसलिए इस कानून जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक दिया गया है में सवर्णों को भी बराबरी पर रखे जाने का समर्थन करता हूं और झूठे आरोप पर दण्ड दिया जाना चाहिए इसका भी पुरजोर समर्थन करता हूं। समानता सार्वभौमिक होनी चाहिए तभी सार्थक होगी।

शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

लेख - स्वयं सम्पादकीय 05, आधुनिक स्त्री विमर्श और स्त्री धन।

     जब से स्त्री विमर्श प्रारंभ हुआ है तब से हर स्त्री विमर्श चिंतक ने यही प्रयास किया है कि किस तरह से समाज में चली आ रही रुढ़िवादी सोच को बदला जाए और नारी को सम्मान तथा समानता के महत्व को स्थापित किया जाए एवं नारी जाति को उसका अधिकार दिलाया जाए और वर्तमान में देश में केन्द्र तथा राज्यों कि सरकारों द्वारा प्रदत्त महिला आरक्षण इसी का फल है और कई तरह के कानूनी अधिकार जैसे तलाक के बाद पति से भरण पोषण का अधिकार इसी का हिस्सा है मगर अब ये आधुनिक स्त्री विमर्ष में किस तरह का पागलपन है माफ करिएगा मेरे पास इससे उपयुक्त कोई शब्द नहीं है इसे लिखने के लिए की एक स्त्री अगर कमाती है तो उस पर पुरा हक मात्र उस स्त्री का होना चाहिए क्या आज तक किसी पुरुष ने ये कहा है कि मैं जो कमाता हूं वो तो पुरुष धन है वो सब का सब मेरा होना चाहिए?, नही उसकी कमाई पर तो पत्नी का हक है, बच्चों का हक है, मां बाप का हक है, तो धर में यदि कोई स्त्री कमाती है तब भी पुरे परिवार का हक क्यों नहीं होना चाहिए। 


     अब मैं जानता हूं कि इस पर कुछ लोग तर्क देंगे कि ये तो समाज हमेशा पुरुषवादी रहा स्त्रियां उपेक्षित रहीं शोषित रही तो स्त्री धन होना चाहिए और परिवार चलाना पुरुष की जिम्मेदारी है ,तो इस पर मेरा एक सीधा सा प्रश्न है कि क्या परिवार केवल पुरुष का ही होता है स्त्री की उसमें कोई जिम्मेदारी नहीं?, क्या वो अपने बच्चों की मां नहीं है?, क्या पति के मां बाप उसके लिए कोई नही?, जब परिवार दोनों का है तो जिम्मेदारियां भी दोनों की होनी चाहिए। स्त्री पुरुष एक समान हैं समाज मे इसी को स्थापित करने कि आवयश्कता है ना।


     पति-पत्नी को गाड़ी के दो पहियों की संज्ञा दी जाती है और दोनों संतुलित रहकर ही परिवार की गाड़ी को चलाते हैं तो फिर एक पहिया एक तरफा अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त कैसे हो सकता है क्या इससे जीवन रुपी गाड़ी चल पाएगी, एकदम नहीं। मेरा मानना है कि आधुनिक स्त्री विमर्श को संशोधित करते हुए स्त्री धन के लक्ष्यों को पुरी तरह से समावेशी और जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए ताकि समाज और परिवार में समानता के मुल्कों को स्थापित किया जा सके। 


     स्त्री धन समाज में एक नए तरह की असमानता है जो परिवार को बनाएं रखने का सारा बोझ अकेले पुरुष के कंधे पर लाद देता है। स्त्री विमर्श पर बात करने वाली हर एक स्त्री को ये ध्यान रखना चाहिए कि यदि आप समाज में समानता चाहती हैं तो आपको अपने समानान्तर एक असमानता का विचार लेकर नही चलना चाहिए।


     स्त्री धन का पुरा विचार ही मुलरुप से असमानता का पर्याय है और यही कारण है कि जब भी कोई पारिवारिक स्त्री चाहे वो कितनी भी शिक्षित हो और चाहे उसका जीवनसाथी कितना भी अधिक धन अर्जित करता हो या कितने भी प्रगतिशील विचारों वाला हो वो स्त्री धन के एकाधिकार से जनित असमानता को सह नही पाता और फिर वो परिवार बिखर जाता है। स्त्रियां को ये स्वीकार करना चाहिए कि स्त्री धन उनका एकाधिकार नही हो सकता जिस तरह से पुरुष धन जैसा कोई विचार समाज में नही है। स्त्री विमर्श को आगे लेकर चलने वाले सभी को यह स्वीकार करना होगा कि समानता कि बात असमानता का पक्षधर होकर नही की जा सकती।