श में जिस देश में पुरुष एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से।
जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता।
जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं।
अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं। एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से।
जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता।
जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं।
अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं।
जिस देश में पुरुष एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से।
जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता।
जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं।
अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं।
