गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

महिलाओं के खिलाफ अपराध पर पुरुष संवेदनहीन या या स्वयं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर मौन है और महिलाओं की संवेदना पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कहां है एक विमर्श

श में जिस देश में पुरुष एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से। 


जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता। 


जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं। 


अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं। एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से।

जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता।

जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं।

अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं।

जिस देश में पुरुष एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से।

जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता।

जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं।

अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

ग्रोक एआई का विरोध क्यों किया जा रहा है और ऐसे एआई के नुक्सानों पर चर्चा।


यह एआई चैट बांट अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क कि कम्पनी एक्स जो पहले ट्वीटर थी का ही एक एआई टूल है जो उपयोगकर्ताओं को उनकी जरुरत के अनुसार जानकारी प्राप्त करने तथा तस्वीरों को निर्मित एवं सम्पादित करने की सुविधा देता है पर अक्सर यह ऐसी जानकारी भी दे देता है जो उपयोगकर्ता द्वारा पूछी ही नहीं गई है। 


यह जो टूल है यह सब्सक्रिप्शन के साथ असिमित फ़ोटो एवं विडियो बनाने की मशिन बन गया है लेकिन सबसे अधिक चिंता कि बात यह है कि इससे बड़ी ही आसानी से किसी भी तस्वीर को अश्लील बनाया जा सकता है और यह एआई यह फर्क करने में असक्षम है कि जिस तस्वीर को यह प्राम्प्ट के अनुसार बदल रहा है वो एआई के द्वारा बनाई गई है या फिर किसी वास्तविक व्यक्ति की है। 


मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले इसे अलग अलग एकाउंट के माध्यम से लगभग तीन महिने तक इस्तेमाल करता रहा हूं। विडियो बनाने वाली इसकी सुविधा तो और भी गैर-निष्पादित और अनियंत्रित है, इससे किसी भी तस्वीर को अश्लील विडियो मे बदला जा सकता है और किसी भी महिला कैसी भी अश्लील हरकत करते हुए दिखाया जा सकता है। यह पुरी तरह से महिलाओं के लिए और पुरुषों के लिए भी असुरक्षित है। 


ग्रोक एआई जैसे जितने भी एआई टूल है या तो उन्हें प्रतिबंध किया जाना चाहिए या इन पर सख़्त निगरानी रखनी चाहिए और यह जिम्मेदारी भारत सरकार कि है कि ग्रोक एआई जैसे सभी एआई भारत के कानूनों को सख्ती से माने और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इन जैसे एआई टूल से किसी व्यक्ति कि गरिमा को कोई हानि ना पहुंचे। 


यह सत्य है कि एआई का सही उपयोग इसे वरदान बना सकता है लेकिन एक गैरजिम्मेदार और अनियंत्रित एआई इस वरदान को अभिशाप मे भी बदल सकता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा एआई बाजार बनने की राह पर है पर इसके लिए हमे जिम्मेदार एआई चाहिए ना कि अनियंत्रित और गैरजिम्मेदार।

शनिवार, 31 जनवरी 2026

यूजीसी का नया कानून विरोध, विवाद और रोक तथा शिक्षण संस्थानों में भेदभाव पर एक विमर्श

 यूजीसी के जारी किए गए नए कानून पर हो रहा विरोध या इस नियम कि प्रासंगिकता और कमियों पर बात करना आवश्यक हो जाता है हालांकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी है तब भी इस विषय पर चर्चा होनी चाहिए। 



भेदभाव को लेकर कोई संशय नहीं है कि ये वर्तमान समाज कि एक कड़वी सच्चाई है जिसे हम सब कुछ कम या ज्यादा पर स्वीकार करते हैं और उच्च शिक्षा संस्थान इसमें कोई अपवाद नहीं हैं पर यह भी जरुरी है कि किसी एक वर्ग को ऐसा ना लगे कि उसे ही निशाना बनाया जा रहा है और जाहिर सी बात है इसी कारण से माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाई है। 

जहां तक भेदभाव कि बात है ये तो उच्च शिक्षा संस्थान के स्तर तक ही नही स्कूल स्तर तक है और मेरे साथ ही ये भेदभाव स्कूल में ही किया गया है। मैं अपना नीजि अनुभव बता रहा हूं, मुझे कक्षा आठ और नौ में कम नम्बर दिए जाते थे क्योंकि हम पढ़ने में अच्छे थे और कोई सवर्ण ऐसा नहीं था और हमारे हेडमास्टर  थे वो सवर्ण वर्ग के थे मै जानबुझकर जाती नहीं लिख रहा हूं नहीं तो कुछ लोग विफर जाएंगे और सबसे हैरत कि बात ये है कि जिस स्कूल कि बात मैं कर रहा हूं वो स्कूल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित था आज भी है फिर भी मैं अपने गुरुओं का पुरा सम्मान करता था, करत हूं और करता रहूंगा।

अब आप ये कह सकते है कि आप तो उस वक्त बच्चे थे आप को कैसे पता कि शिक्षक जानबूझकर कम नंबर दे रहे थे और भेदभाव कर रहे थे तो उस वक्त हम लोगों को परिक्षा परिणाम घोषित होने के बाद कापियां दिखाई जाती थी, तो ऐसा कम से कम तीन से चार बार हुआ कि मैं ने कापि देखने के बाद जब मैंने आचार्य जी को कहा तो उन्होंने ने मेरे नंबर सुधारें। कक्षा नौ कि अंकसूची में वाकायदा प्रिंसिपल सर के सुधार के दस्तखत है।

तो मेरा ये कहना है कि ऐसा तो है नही की जो पाठ मैं ने आचार्य जी से सिखा और फिर पेपर मे उत्तर लिखा वो कापि जांचने के समय आचार्य जी स्वयं ही भुल जाते होंगे।

तो आप ये माने या ना माने पर भेदभाव तो है पर मैने नीजि तौर पर उच्च शिक्षा मे यह अनुभव नही किया है।

और मै समानता को वास्तविक रुप में चाहता हूं इसलिए इस कानून जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक दिया गया है में सवर्णों को भी बराबरी पर रखे जाने का समर्थन करता हूं और झूठे आरोप पर दण्ड दिया जाना चाहिए इसका भी पुरजोर समर्थन करता हूं। समानता सार्वभौमिक होनी चाहिए तभी सार्थक होगी।