सोमवार, 7 सितंबर 2026

भारत में संयुक्त रविवार कैसे तोड़े गए पुरी चर्चा

 

2018 के व्याभिचार को मान्यता देने वाले अपने फ़ैसले में चन्द्रचुड ने निवेदिता मेनन को कोट किया है वही जेएनयू वाली प्रोफेसर और चन्द्रचुड खुद किस देश से पढ़ा है ये हम सब को पता है।

भारत की परिवार व्यवस्था को तोड़ने की कोशिश क्रिश्चियन डीप स्टेट तीन सौ सालों से कर रहा है और वो अब बहुत हद तक कामयाब हो गए हैं। मैं चरण समझाता हूं आपकों।

1. 1820 में ज़मीन को निजी सम्पत्ति बनाना यानी किसी एक व्यक्ति के नाम पर ज़मीन इससे पहले ज़मीन गांव कि होती थी और खेती करने के लिए पुरा परिवार एक साथ गांव कि ज़मीन का कुछ हिस्सा राजा से प्राप्त करता था बदले में कर देता था और परिवार के बीच सम्पत्ति को लेकर कोई झगड़ा नहीं लेकिन इसके बाद होने लगे
2. तो 1822-70 के बीच में एक दर्जन छोटे बड़े कोर्ट बनाएं गए
3. 1826 में सती प्रथा रोकनें के नाम पर महिलाओं को निशाना बनाया गया
4. 1880-1890 के मध्य आई पी सी और सी आर पी सी बनाकर परिवारों को छोटे छोटे झगड़ों में आपस में लड़वाया गया और कोर्ट को समाधान कि तरह पेश किया गया जिसकी वर्षों कि लंम्बी प्रकिया बनाई गई जबकि गांव कि पंचायत पहले एक दिन मे समाधान कर देती थी।
5. फिर तो हम सब जानते हैं कि कैसे हिन्दू कोड बिल लाया गया 1952-55 में और लाने वाले वही कथित प्रोग्रेसिव विचारक जो विदेशी वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे।
6. फिर विडंबना देखिए कि हमारी धन सम्पत्ति लुटने वाले हमारे कथित नेताओं को दो बच्चा कैम्पेनिंग शुरु करवाया।
7. इनका साथ दिया वालीवुड ने लगातार विदेशी कम्पनियों से पैसे लेकर ऐसी फिल्में बनाई गई जिसमें घर के पुरुषों को बलात्कारी दिखाया गया महिलाओं को उत्पिडन का शिकार दिखाया गया।
8. फिर 498A और डोमेस्टिक वायलेंस जैसे कानुनों को लाकर यह पुख्ता कर दिया गया कि अब घर कि महिला ही संयुक्त परिवार नहीं रहने देगी। और इन कानुनों को लाने के लिए दबाव बनाने वाली फेमिनिस्ट लगभग सभी किसी न किसी डिप स्टेट के एनजीओ या फाउंडेशन से जुड़ी थी।
9. फिर 1992-95 के बाद से जब से टीवी घरों में लोकप्रिय हुआ तो इन्होंने वही फिल्मों वाला ज़हर टीवी सिरियलो के माध्यम से डालना शुरु कर दिया।
10. आप और हम सब जानते हैं कि अपने जमाने के एक फ्लाप हिरो की बेटी आज जो टीवी सीरियल बनाती है उसमें क्या दिखाया जाता है उसमे सास बहू को लड़वाया जाता है ननद भाभी को लड़वाया जाता है ज़ो पहले भाभी होती है वही बाद में देवर कि बीबी हो जाती है और न जाने क्या क्या। और आज उस महिला के पास पचास हजार करोड़ की प्रोडक्शन कम्पनी है।

इसके सिरियलो ने लड़कियों के दिमाग में भर दिया कि एक साथ रहेंगे तो झगड़ा होगा जीवन बर्बाद हो जाएगा तो वो विवाह होकर जाते ही पति को मां बाप से दुर कर देती है। और भारत में व्याभिचार को कैसे बढ़ावा दिया गया इस पर तो कभी बात ही नहीं की हैं मैंने।

और परिवार कि इस टुटन का फायदा उठाने के लिए डेढ़ मिलियन से ज्यादा एन जी ओ चलाएं जा रहें हैं और बहुत पुराने आंकड़े के अधार पर हर साल भारत में बीस हजार करोड़ से लेकर एक लाख करोड़ रुपए तक इन एनजीओ को दान मिलता है यूरोप से अमेरिका से भारत में खुशहाली लाने के लिए तो मतलब हम सब समझ सकतें हैं और हम सब लोगों ने ताजा ताजा देखा हैं जब सरकार FCRA एमेड करना चाहती थी तो अमेरिका में विरोध होने लगा था।

हम सब को यह याद रखना चाहिए कि इंडिया इज अ अन फिनिस्ड प्रोजेक्ट फार क्रिश्चियन डीप स्टेट।

रविवार, 24 मई 2026

लेख, क्या हमे सिर्फ बेटी ही बचानी है अपने बेटे नहीं?


     आजकल भोपाल के एक केस की पुरे देश में बहुत चर्चा हो रही है और जोर शोर से बेटी बचाओ बेटी बचाओ गुंज रहा है और दहेज प्रथा को इसका मुल कारण माना जा रहा है, चलिए ठीक है लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि आखिर आज भी हमारे समाज में दहेज़ प्रथा चल क्यों रही है सिर्फ दहेज़ मांगने वाले लोगों के कारण या दहेज़ देने वालों के कारण जो अपनी बेटियों के लिए अमिर दामाद खरीदने की कामना करते हैं। 

     और क्या आज समाज में रिवर्स दहेज़ नहीं चल रहा है,जी हां मैं तलाक के बाद महिलाओं को मिलने वाली मोटी रकम जीसे कानुनी भाषा में एल्युमनी, मेंटेनेंस उसकी बात कर रहा हूं क्या यह सीधे तौर पर रिवर्स दहेज़ प्रथा नहीं है। क्या इस रिवर्स दहेज़ के कारण बेटे आत्महत्या नहीं कर रहे हैं क्या रिवर्स दहेज़ लोभी महिलाओं और उनके परिवारों के कारण लड़के आत्महत्या नहीं कर रहे हैं उनके परिवार नहीं उजड़ रहे हैं। 

     हर बार किसी बेटी की मौत पर बेटी बचाने की गुहार लगाने वाले लोग क्या बेटों को नहीं बचाना चाहते।बेटे भी बचाइए बेटे न तो गुगल से डाऊनलोड होते हैं और ना ही एआई से जनरेट होते हैं उन्हें भी माएं ही जन्म देती हैं। 

     एक बेटे को आत्महत्या के लिए उकसाने वाली पत्नी या पूर्व पत्नी और उसका परिवार भी उतना ही बड़ा गुनहगार है जीतना बड़ा एक बेटी को आत्महत्या के लिए उकसाने वाला उसका पति या पूर्व पति और उसका परिवार। 

     अब समय है कि अपराध को अपराध की तरह देखा जाना चाहिए उसे बेटी और बेटे के सांचे में ढालकर नहीं।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

महिलाओं के खिलाफ अपराध पर पुरुष संवेदनहीन या या स्वयं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर मौन है और महिलाओं की संवेदना पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कहां है एक विमर्श

श में जिस देश में पुरुष एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से। 


जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता। 


जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं। 


अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं। एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से।

जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता।

जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं।

अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं।

जिस देश में पुरुष एक धन कमाने की मशिन है और हाई कोर्ट भीख मांगकर भी पत्नी को मेंटेनेंस देने की सजा सुनाता है और वह इतना आजाद है कि खुलकर रो भी नहीं सकता कहीं नामर्द ना समझ लिया जाए और हर एक घंटे में एक यूवा बेरोजगारी और परिवार के दबाव में आत्महत्या करता है क्योंकि वो चार पैसे नहीं कमा पा रहा है तो जब भी मैं पितृसत्ता की दलील सुनता हूं तो मुझे घिन आती है ऐसे दलील देने वालों से।

जिस देश में दहेज़ के 90% और घरेलू हिंसा के 95% मामले झूठे निकलते हैं और तब अगर कोई मैरिटल रेप की दलील देता है तो मेरी सहानूभूति भी उसके लिए मर जाती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध को इतना रोया गया है कि पुरुष अपनी जान देकर भी अपनी आपबीती नहीं सुना सकता।

जिस देश मे कानुन तक ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि किसी पुरुष का भी बलात्कार हो सकता है उसके साथ भी घरेलू हिंसा हो सकती है तो वहां जाहिर सी बात है महिलाओं के खिलाफ अपराध ही चर्चा का विषय रहेंगे क्योंकि पुरुषों का आंकड़ा तो कोई लिख ही नहीं रहा है पुलिस भी नहीं।

अब सवाल ये है कि यदि पुरुष महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए संवेदनहीन है तो क्या महिलाएं पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर संवेदनशील है या संवेदनहीन होकर नीले ड्रम पर मिम्स बना रहीं हैं और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के साथ तुलना करके अपना मौन समर्थन दे रहीं हैं।