यूजीसी के जारी किए गए नए कानून पर हो रहा विरोध या इस नियम कि प्रासंगिकता और कमियों पर बात करना आवश्यक हो जाता है हालांकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी है तब भी इस विषय पर चर्चा होनी चाहिए।
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भेदभाव को लेकर कोई संशय नहीं है कि ये वर्तमान समाज कि एक कड़वी सच्चाई है जिसे हम सब कुछ कम या ज्यादा पर स्वीकार करते हैं और उच्च शिक्षा संस्थान इसमें कोई अपवाद नहीं हैं पर यह भी जरुरी है कि किसी एक वर्ग को ऐसा ना लगे कि उसे ही निशाना बनाया जा रहा है और जाहिर सी बात है इसी कारण से माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाई है।
जहां तक भेदभाव कि बात है ये तो उच्च शिक्षा संस्थान के स्तर तक ही नही स्कूल स्तर तक है और मेरे साथ ही ये भेदभाव स्कूल में ही किया गया है। मैं अपना नीजि अनुभव बता रहा हूं, मुझे कक्षा आठ और नौ में कम नम्बर दिए जाते थे क्योंकि हम पढ़ने में अच्छे थे और कोई सवर्ण ऐसा नहीं था और हमारे हेडमास्टर थे वो सवर्ण वर्ग के थे मै जानबुझकर जाती नहीं लिख रहा हूं नहीं तो कुछ लोग विफर जाएंगे और सबसे हैरत कि बात ये है कि जिस स्कूल कि बात मैं कर रहा हूं वो स्कूल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित था आज भी है फिर भी मैं अपने गुरुओं का पुरा सम्मान करता था, करत हूं और करता रहूंगा।
अब आप ये कह सकते है कि आप तो उस वक्त बच्चे थे आप को कैसे पता कि शिक्षक जानबूझकर कम नंबर दे रहे थे और भेदभाव कर रहे थे तो उस वक्त हम लोगों को परिक्षा परिणाम घोषित होने के बाद कापियां दिखाई जाती थी, तो ऐसा कम से कम तीन से चार बार हुआ कि मैं ने कापि देखने के बाद जब मैंने आचार्य जी को कहा तो उन्होंने ने मेरे नंबर सुधारें। कक्षा नौ कि अंकसूची में वाकायदा प्रिंसिपल सर के सुधार के दस्तखत है।
तो मेरा ये कहना है कि ऐसा तो है नही की जो पाठ मैं ने आचार्य जी से सिखा और फिर पेपर मे उत्तर लिखा वो कापि जांचने के समय आचार्य जी स्वयं ही भुल जाते होंगे।
तो आप ये माने या ना माने पर भेदभाव तो है पर मैने नीजि तौर पर उच्च शिक्षा मे यह अनुभव नही किया है।
और मै समानता को वास्तविक रुप में चाहता हूं इसलिए इस कानून जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक दिया गया है में सवर्णों को भी बराबरी पर रखे जाने का समर्थन करता हूं और झूठे आरोप पर दण्ड दिया जाना चाहिए इसका भी पुरजोर समर्थन करता हूं। समानता सार्वभौमिक होनी चाहिए तभी सार्थक होगी।


